रामधारीसिंह ‘दिनकर’ का जीवन परिचय..

रामधारीसिंह ‘दिनकर’ जीवन-परिचय

राष्ट्रीय भावनाओं के अमर गायक रामधारीसिंह ‘दिनकर’ का जन्म बिहार प्रान्त के मुंगेर जिले के अन्तर्गत सिमरिया ग्राम मैं सन् 1908 ई० को एक साधारण किसान परिवार में हुआ था।

परिचय: एक दृष्टि में

नामरामधारीसिंह ‘दिनकर’
जन्मसन् 1908 ई०
जन्म-स्थानबिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया नामक ग्राम में।
शिक्षाबी. ए.
लेखन- विद्यानिबन्ध, संस्कृति ग्रन्थ, आलोचना, काव्य ग्रन्थ
भाषा-शैलीसंस्कृतनिष्ठ, प्रांजल प्रौढ़ तथा सुबोध भावात्मक, समीक्षात्मक, सूक्तिपरक तथा विवेचनात्मक।
प्रमुख रचनाएँरेणुका, रसवन्ती, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा, कुरुक्षेत्र उर्वशी, अर्द्धनारीश्वर, उजली आग, संस्कृति के चार अध्याय, मिट्टी की और शुद्ध कविता की खोज।
निधन24 अप्रैल, 1974 ई0
साहित्य में स्थानइन्हें हिन्दी साहित्य जगत् में राष्ट्रकवि की ख्याति प्राप्त थी। इनको गणना विश्व के महान साहित्यकारा में होती है।

सन् 1933 ई० में पटना कॉलेज से बी०ए० को परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् इन्होंने कुछ दिनों के लिए उच्च माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक का कार्यभार संभाला। इसके बाद सन् 1934 ई० में सरकारी नौकरी कर ली और उपनिदेशक, प्रचार विभाग के पद पर स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद तक कार्य करते रहे। कुछ समय तक इन्होंने बिहार विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। सन् 1952 ई० में इन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया, तभी से दिल्ली आकर रहने लगे।

सन् 1964 ई० में इन्हें केन्द्र सरकार की हिन्दी समिति का परामर्शदाता मनोनीत किया गया। सन् 1959 ई० में भारत सरकार ले इन्हें ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया तथा सन् 1962 ई० में भागलपुर विश्व विद्यालय ने डी० लिट्. की उपाधि प्रदान की।

दिनकरजी ने एक लेखक और कवि के रूप में अनेक प्रतिनिधिमण्डलों का प्रतिनिधित्व भी किया। सन् 1972 ई० में इनके बहुचर्चित काव्य ‘उर्वशी’ पर ज्ञानपीठ का एक लाख रु० का पुरस्कार प्रदान किया गया। ‘हुंकार’ काव्य-संग्रह प्रकाशित होने पर इनकी गणना राष्ट्रकवियों में की जाने लगी। 24 अप्रैल, 1974 ई० को राष्ट्रकवि दिनकरजी का निधन हो गया।

साहित्यिक परिचय

दिनकरजी ने हिन्दी के अतिरिक्त संस्कृत, बांग्ला, उर्दू आदि भाषाओं का भी गहन अध्ययन किया। दिनकरजी ने एक कवि के रूप में अपेक्षाकृत अधिक ख्याति प्राप्त की, परन्तु फिर भी गद्य की विभिन्न विधाओं पर इनका समान अधिकार था। दिनकरजी ने गद्य के क्षेत्र में हिन्दी साहित्य की अपूर्व सेवा की। इनके प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘संस्कृति के चार अध्याय’ को साहित्य अकादमी ने पुरस्कृत किया। इन्होने

साहित्य को अनेक अनुपम रचनाओं की धरोहर हिन्दी-साहित्य की प्राप्त हुई। सम्बन्धी साहित्य में भी दिन अपनी भौतिक प्रतिभा का परिचय दिया है। इनके आलमक ग्रन्थों में भारतीय पाश्चात्य समीक्षा सिद्धान्तको सुन्दर ढंग से विवेचन हुआ है। एक के रूप में ये भारतीय साहित्य के इतिहास में सदैव के लिए अमर हो गए है। राष्ट्रीय भावनाओं पर आधारित कविताएं लिखने के कारण से राष्ट्रकवि के रूप में विख्यात हुए।

कृतिया ‘रेणुका’, ‘रसवन्ती’, ‘इन्द्रगीत’, ‘धूप छाव’, ‘हुंकार’, ‘बापू’ एकायन’, ‘इतिहास के ओ परशुराम की प्रतीक्षा’, ‘रश्मिरथी’, ‘नोलकुसुम’, ‘नीम के पत्ते’, ‘सोमी और संख’, ‘कुरुक्षेत्र’ तथा श निबन्ध संग्रह ‘अन’ रेती के फूल’, ‘ट पीपल’, ‘उजली आग आदि। दार्शनिक और सांस्कृतिक निबन्ध ‘धर्म’, ‘भारतीय संस्कृति की एकता’, ‘संस्कृति के चार अध्याय’ आलोचना ‘मिट्टी की ओर’, ‘शुद्ध कविता को खोज’ आदि।

भाषा-शैली : भाषा-दिनकरजी ने अपने गद्य-साहित्य में शुद्ध, परिष्कृत, परिमार्जित और साहित्यिक खाँबोली का प्रयोग किया है। उनकी भाषा विषयानुरूप और भावानुरूप बन पड़ी है। उसी का परिणाम है कि जहाँ पर गम्भीर विष विवेचन किया गया है वहां भाषा संस्कृतनिष्ठ है। यथा— ‘संस्कृति के चार अध्याय जैसी गम्भीर विवेचनात्मक रचनाओं मे दिनकरजी की भाषा संस्कृतनिष्ठ है। इसके साथ ही सरल विषयों पर विचार प्रकट करते समय दिनकरजी ने सहज और व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया है। इस प्रकार दिनकरजी की भाषा में ओज, माधुर्य, प्रांजलता और बोधगम्यता के दर्शन होते हैं।

शैली—दिनकरजी के गद्य-साहित्य में मुख्य रूप से निम्नलिखित शैलियों के दर्शन होते है-

1. आलोचनात्मक शैली– दिनकरजी की समीक्षात्मक रचनाओं में इस शैली के दर्शन होते हैं। इसमें गम्भीर विचारोंके साथ भाषा सरल और सुबोध है। इसके अतिरिक्त इस शैली में वाक्य- बिल्यास सुसंगठित और सरल बन पड़ा है।

2. भावात्मक शैली– दिनकरजी का कवि हृदय गद्य साहित्य में भी स्थान-स्थान पर मुखरित हो उठा है। ऐसे स्थलों पर उनकी भाषा सरसता, काव्यात्मकता, आलंकारिकता और कोमलता के गुणों से ओत-प्रोत दिखाई देती है।

3. विवेचनात्मक शैली– दिनकरजी के व्यक्तित्व को स्पष्ट झलक इस शैली में मिलती है। इस शैली का प्रयोग गम्भीर विषयों का विवेचन करते समय किया गया है। प्रभावोत्पादकता, गम्भीरता, सारगर्भिता आदि गुण इस शैली में विशेष रूप सेसाकार हुए हैं।

4. सूक्ति शैली– जब लेखक अपने गहन चिन्तन और व्यापक ज्ञान से ऐसे वाक्य लिख जाता है, जिनका महत्त्व सार्वकालिक होता है वहाँ सूक्तिप्रधान शैली होती है। दिनकरजी सूक्ष्म विषयों और गहन चिन्तनशील विषयों के लेखक है; अतः इनके गद्य साहित्य में स्थान-स्थान पर इस शैली के दर्शन होते है। इसके अतिरिक्त उनके साहित्य में काव्यात्मक शैली, उद्धरण शैली, वार्तालाप शैली, आत्मकथात्मक उद्बोधन आदि शैलियों का प्रयोग भी देखने को मिलता है।

हिन्दी साहित्य में स्थान– दिनकर जी हिन्दी साहित्य जगत् को विशेष निधि हैं। ‘संस्कृति के चार अध्याय उनकी ऐसी गद्य-कृति है, जो हिन्दी गद्य साहित्य का मील का पत्थर है। दिनकरजी मानवता के पोषक तथा शोषण के विरोधी है। अपने साहित्य के माध्यम से इन्होने समाज, संस्कृति और धर्म में व्याप्त रूढ़ियों का खण्डन करके जन-मानस में सच्ची राष्ट्रीयता का भाव भरने का प्रयत्न किया। राष्ट्रीय भावनाओं पर आधारित इनका साहित्य भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर है। इनकी गणना विश्व के महान् साहित्यकारों में होती है।

निष्कर्ष

भारतीय सरकार में आपका स्वागत है दोस्तों इस पोस्ट के माध्यम से रामधारी सिंह दिनकर से संबंधित महत्वपूर्ण लेख एवं उनके द्वारा हिंदी साहित्य में योगदान उनके रचित रचनाएं तथा उनके जीवन से संबंधित पूरी जानकारी आप तक पहुंचा दी गई है। अगर आपको इस पोस्ट की माध्यम से पूरी जानकारी मिल चुकी हो तो अधिक से अधिक शेयर करें।

FAQ

Q.रामधारी सिंह दिनकर को राष्ट्रीय कवि क्यों कहा जाता है?

A. मानव-मात्र के दुख-दर्द से पीड़ित होने वाले कवि थे. राष्ट्रहित उनके लिए सर्वोपरि था

Q. रामधारी सिंह दिनकर क्यों प्रसिद्ध है?

A. दिनकर आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं. उनकी कविताओं ने आजादी की लड़ाई में लोगों को जागरूक किया

Q. रामधारी सिंह दिनकर की पहली रचना क्या है?

A. दिनकर का पहला काव्यसंग्रह ‘विजय संदेश’ वर्ष 1928 में प्रकाशित हुआ.

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